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सवाल यह नहीं कि चेयरमैन कौन बना, सवाल यह है कि दक्षिणी हरियाणा से कोई क्यों नहीं बना....? या फिर दूसरा—क्या दक्षिणी हरियाणा की पैरवी उतनी मजबूत नहीं हो पाई जितनी होनी चाहिए थी...? क्या कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर होगी...? फिलहाल इतना तय है कि चेयरमैनों की सूची से ज्यादा चर्चा उस नाम की हो रही है जो सूची में नहीं था—दक्षिणी हरियाणा

 





चार को टिकट, चालीस को इंतज़ार? दक्षिणी हरियाणा में उठते सवाल और राव इंद्रजीत की परीक्षा


राजनीति में जीत सिर्फ चुनाव जीतने का नाम नहीं होती, असली जीत तब होती है जब कार्यकर्ता खुद को सम्मानित और प्रतिनिधित्व महसूस करे।


दक्षिणी हरियाणा की राजनीति में यदि किसी एक नेता का नाम सबसे प्रभावशाली चेहरों में लिया जाता है तो वह केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह हैं। वर्षों से उनकी राजनीतिक पकड़, संगठन पर प्रभाव और टिकट वितरण में उनकी भूमिका को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। माना जाता है कि जिस उम्मीदवार के सिर पर राव साहब का हाथ हो, उसकी टिकट की राह आसान हो जाती है और जीत की संभावना भी बढ़ जाती है।


लेकिन निगमों और बोर्डों के चेयरमैनों की हालिया सूची ने दक्षिणी हरियाणा के राजनीतिक गलियारों में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है।


सवाल यह नहीं कि चेयरमैन कौन बना। सवाल यह है कि दक्षिणी हरियाणा से कोई क्यों नहीं बना?


क्षेत्र के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच चर्चा है कि विधानसभा चुनावों में कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने दिन-रात मेहनत कर पार्टी को मजबूत किया। टिकटों के समय भी क्षेत्र की राजनीतिक ताकत दिखाई दी। लेकिन जब सत्ता में भागीदारी बांटने की बारी आई, तब दक्षिणी हरियाणा का नाम सूची से लगभग गायब दिखाई दिया।


दबी जुबान में लोग कह रहे हैं—


"राव साहब ने चार को टिकट तो दिला दिए, लेकिन चालीस कार्यकर्ताओं की उम्मीदों को घर बैठा दिया।"


यह टिप्पणी भले ही राजनीतिक हो, लेकिन इसके पीछे कार्यकर्ताओं की वह पीड़ा छिपी है जो वर्षों से संगठन के लिए मेहनत करते आए हैं। उन्हें उम्मीद थी कि इस बार बोर्डों और निगमों में उनके क्षेत्र को भी सम्मानजनक प्रतिनिधित्व मिलेगा।


अब चर्चा दो सवालों पर आकर टिक गई है।


पहला—क्या यह भाजपा की व्यापक राजनीतिक रणनीति थी?


या फिर दूसरा—क्या दक्षिणी हरियाणा की पैरवी उतनी मजबूत नहीं हो पाई जितनी होनी चाहिए थी?


राजनीति में धारणा ही सबसे बड़ी ताकत होती है। आज कार्यकर्ताओं के बीच जो धारणा बन रही है, वह यह है कि चुनाव के समय उनकी जरूरत थी, लेकिन पुरस्कार और सम्मान के समय उनकी बारी नहीं आई।


दक्षिणी हरियाणा हमेशा भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। ऐसे में यदि यहां के कार्यकर्ताओं को प्रतिनिधित्व नहीं मिलता, तो आने वाले समय में यह सवाल और बड़ा हो सकता है।


क्योंकि कार्यकर्ता सिर्फ नारे नहीं लगाता, वह उम्मीद भी पालता है।


वह सिर्फ झंडा नहीं उठाता, वह सपना भी देखता है।


और जब सपने टूटते हैं, तो सवाल पैदा होते हैं।


आज दक्षिणी हरियाणा में वही सवाल गूंज रहा है—


"क्या हमारी मेहनत सिर्फ चुनाव तक सीमित थी?"


राव इंद्रजीत सिंह की राजनीतिक ताकत पर किसी को संदेह नहीं है। लेकिन राजनीति में सबसे कठिन काम ताकत दिखाना नहीं, बल्कि अपने समर्थकों की उम्मीदों को जिंदा रखना होता है।


अब निगाहें भविष्य पर हैं।


क्या दक्षिणी हरियाणा को आने वाले दिनों में कोई बड़ी राजनीतिक हिस्सेदारी मिलेगी?


क्या कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर होगी?


या फिर यह सवाल और बड़ा होकर राजनीतिक बहस का विषय बनेगा?


फिलहाल इतना तय है कि चेयरमैनों की सूची से ज्यादा चर्चा उस नाम की हो रही है जो सूची में नहीं था—दक्षिणी हरियाणा।

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