ज्योतिषीय ग्रंथों में ग्रहों की विभिन्न स्थितियों से बनने वाले अनेक योग का वर्णन मिलता है। इनमें से कुछ शुभ फल देने वाले होते हैं तो कुछ बुरा परिणाम देते हैं। इन्हीं में एक चर्चित योग है केमद्रुमक योग। ज्योतिष में यह बहुत ही चर्चित योग है। इसे केमद्रुम और केमद्रुमक दोनों ही नाम से जाना जाता है। किसी कुंडली में केमद्रुमक योग के बनने ज्योतिषीय दृष्टि से अच्छा नहीं माना गया है। कुंडली में इस योग के बनने से जीवन में समस्या, संघर्ष और विपरीत परिणाम देने वाला योग माना गया है। इसे केमद्रुमक दोष भी कहा जाता है। ज्योतिषाचार्य विभोर इंदुसुत के अनुसार कुंडली में वास्तव में चंद्रमा की विशेष स्थिति बनने वाला यह विशेष योग है। जब किसी कुंडली में चंद्रमा के आगे और पीछे वाले भाव में कोई भी ग्रह न हो, अर्थात चंद्रमा से दूसरा और बारहवां भाव पूरी तरह से खाली हो तो इस तरह बनने वाला योग केमद्रुमक योग कहलाता है। इस योग की गणना में छाया ग्रह राहु और केतु का आंकलन नहीं किया जा सकता।
ज्योतिष में इस योग का अच्छा परिणाम नहीं देने वाला माना गया है। जिस व्यक्ति की कुंडली में केमद्रम योग बने तो उसके जीवन में संघर्ष की अधिकता रहती है। ऐसे लोगों के जीवन में बहुत सी परेशानियां आती रहती हैं। ऐसा व्यक्ति जीवन में तरक्की नहीं कर पाता। संपन्न परिवार में जन्म होने पर भी व्यक्ति के जीवन में अभाव रहता है। चूंकि चंद्रमा मन का कारक माना गया है। ऐसे में केमद्रमक योग बनने से व्यक्ति में नकारात्मक सोच अधिक रहती है। ऐसा व्यक्ति बहुत ही संवेदनशील होता है। वह छोटी-छोटी बातों को लेकर बहुत परेशान हो जाता है। मन व्यथित रहता है



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